Sunday, August 16, 2009

वह मनुष्य!

था तो मनुष्य ही वह,
मनुष्य की-सी काया,मस्तिष्क,भावनाएँ,
परन्तु केवल ये ही नहीं,
मनुष्य का-सा भाग्य भी था उसका,
एवं उपहास उड़ती हुई विषमतर परिस्थितियाँ|

एक पथभ्रष्ट पथिक की भांति,
चला जा रहा था वह|
अपने मार्ग, अपनी महत्वाकांक्षाओं से विमुख,
एक ऐसे अनुपम, आलौकिक प्रकाश की खोज में निरंतर,
जिसमें उसकी स्वीकृति, अस्वीकृति, मौन,
सब विलीन हो जाए|

जीवन समर्पित कर दिया था उसने,
उन प्राणियों को,
जो कहते थे की वे उसके अपने हैं, शुभचिंतक हैं|
भावना-विहीन हो गया था वह,
किंतु लेशमात्र भी दुःख नहीं था!
बलिदान की पराकाष्ठा बन चुका था वह,
चला जा रहा था उस कंटक-पथ पर|

मार्ग में जल देखकर तृष्णा बुझाने के लिए रुका,
परन्तु यह क्या?
ताल में अपने ही प्रतिबिम्ब से घबरा गया वह|
"क्या यह मैं हूँ? हे इश्वर! मैं ऐसा तो होना चाहता था मैं| ऐसे जीवन से तो मृत्यु ही भली!"
काल-चक्र का ग्रास बन चुका था वह|
मानव जीवन का प्रत्यक्ष उदाहरण|
परन्तु विडम्बना तो देखो,
मृत्यु ने भी उसे स्वीकारा!
हाय जीवन!